टीकाकरण के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाता है। यह एसएमएस सेवा की तरह है, जो टीका लगवाने के लिए लगातार आगाह करती है। यह सेवा अब भी काम कर रही है। इससे दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में रह रही आबादी तक टीकाकरण के फायदे सीधे पहुंच रहे हैं।% जब बांग्लादेश में ऐसा व्यवस्थित तंत्र विकसित हो सकता है, तो मध्य प्रदेश में क्यों नहीं? विशेष रूप से तब, जब हाल ही में सामने आई रिपोर्ट में मध्य प्रदेश को देश के ऐसे राज्यों में शामिल किया गया है, जो टीकाकरण में पीछे हैंमध्य प्रदेश में टीकाकरण की विसंगतियों को समझने के लिए देश की समग्र स्थिति पर नजर डालना भी जरूरी है। भारत में टीकाकरण अभियान भले वर्ष 1978 में शुरू हुआ, लेकिन 19 नवंबर 1985 से यह व्यापक रूप में सामने आया। इसके आकार-आवश्यकता को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि यह अभियान विश्व के सबसे बड़े स्वास्थ्य सुधार कार्यक्रमों में शामिल है। जन्म लेने वाले हर बच्चे के लिए संपूर्ण टीकाकरण अनिवार्य है, लेकिन अभी भी 30 प्रतिशत बच्चे इससे वंचित हैं। इस कमी की भरपाई के लिए केंद्र सरकार ने पांच साल पहले मिशन इंद्रधनुष% शुरू किया था। इसका उद्देश्य डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस, पोलियो, टीबी, खसरा और हेपटाइटिस-बी के खिलाफ वर्ष 2020 तक हर बच्चे को टीकाकरण के दायरे में लाना था। पहले चरण में 28 राज्यों के 201 ऐसे जिलों को चिन्हित किया गया था, जहां बच्चों का टीकाकरण अधूरा था या फिर वे टीकाकरण से वंचित थे। इनमें से 82 जिले मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के थे। पहले चरण में मध्य प्रदेश के 14 जिलों को शामिल किया गया था। अब 02 दिसंबर 2019 से एक बार फिर इस मिशन को शुरू किया जा रहा है। 11 बीमारियों को खत्म करने के लिए 10 टीके हैं। 90 फीसदी का लक्ष्य लेकर 43 जिलों में टीकाकरण का यह व्यापक अभियान शुरू होगा। सवाल उठना स्वाभाविक है कि पहले 14 जिले और अब 43? क्या तुलनात्मक रूप से मध्य प्रदेश और पिछड़ गया है?टीकाकरण के लिए देश में बनी स्वास्थ्य अधिकारियों की पहली बैच के अधिकारी और दो बूंद जिंदगी की% जैसा नारा देकर चर्चित हुए प्रदेश के राज्य टीकाकरण अधिकारी डॉ. संतोष कुमार शुक्ला के पास इसका जवाब आंकड़ों में है। वे कहते हैं- 1000 वन्य ग्राम, 89 आदिवासी ब्लॉक, 1.20 लाख मजरे-टोले और 14 प्रतिशत पलायन, इतनी विषम परिस्थितियां देश के किसी और राज्य में नहीं हैं। इन्हें पहचानते हुए ही इस बार 90 फीसदी टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, रीवा, शिवपुरी, उमरिया को छोड़ दें, तो बाकी सभी जिले लक्ष्य से लगभग 10 फीसदी पीछे हैं। अब इस रिक्त स्थान को भरने की जरूरत है। वर्ष 2023 तक 09 माह से 15 साल तक के प्रदेश के सभी बच्चों में खसरा, रूबेला रोग का नामोनिशान मिटाने का लक्ष्य रखा गया है। इससे पहले 1978 में चेचक (स्मॉल पॉक्स), 2014 में पोलियो और 2015 में टिटनेस को निर्मूल किया गया है।निसंदेह 10 प्रतिशत का यह रिक्त स्थान सुनने में आसान लगता है, लेकिन जमीनी तस्वीर कठोर है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि टीकाकरण में 30 प्रतिशत का सुधार लाने में 34 साल (1985 से 2019) लग गए। यहां तीन साल में 10 प्रतिशत का लक्ष्य है।
गंभीर बीमारियों की नजर से बचें, टीका जरूर लगवाएं